Wednesday, October 20, 2010

शुभकामनाये

स्नेह के अनुपम भाव,
भावों में, सितारों की हाजिरी,
और शरद पूनम के चाँद से निकलती हुई चांदनी का आभास,
ऐसे माहौल में दिल से निकलती हुई शुभकामनाये,
सभी दोस्तों और रिश्तों को सादर......प्रणाम के साथ...

प्यारा रिश्ता कभी पराया नहीं बन सकता,

प्यारा रिश्ता कभी पराया नहीं बन सकता,

फूल की तरह, उसकी खुशबू दिखाई नहीं देती मगर वह होती जरुर है,

हवा भी होती है मगर दिखाई नहीं देती, जो दिखाई नहीं देती वही इश्वर की संगत होती है,

याद भी दिखाई नहीं देती किन्तु अहसास दिलाती रहती है,

करीब होते है तब न याद होती है न कीमत,

दूर रहते है तब ही इन दो बातों की कदर होती है,

अगर कदर न हो कभी, वह रिश्ता प्यारा नहीं होता,

काश कोई जवाब होता

फूलों की कोई भाषा नहीं होती तो फिर सुहास और रंगत को क्या समझे !
आभ की कोई अभिलाषा नहीं होती तो सितारों की संगत को क्या समझे !
बर्फ की चादर से लिपटी हुई पहाड़ियों, वादिओं को ठण्ड का पता नहीं होता,
धरती की कोई मधुशाला नहीं होती तो झील झरनों की पंगत को क्या समझे!

जमीन पर, चाँद तारों समेत नभ को लाने वाला काश कोई जवाब होता,
मन में भक्ति, शक्ति समेत रभ को लाने वाला काश कोई लाजवाब होता,

(श्री हरीश खेतानी "हरि") 

इश्वर का हस्ताक्षर

संगीन कारण से जो किरण निकलती है,

उसका तेज या प्रकाश का प्रकार कभी कभार ही देखने को मिलता है,

जब देखने को मिले तब उस आकार को इश्वर का हस्ताक्षर समझ लेना,

पर्वत, झरनें, नदियाँ, सागर,

पेड़, पौधे, फूल, पंछी, आकाश, और भी..

यह सब इश्वर के हस्ताक्षर ही तो है,

फूल भी न केवल मुस्कुरा सकते है, बल्कि बोल भी सकते है,

जब उसकी भाषा समझ में आने लगे तब उसे इश्वर का साक्षात्कार मान लेना,

(श्री हरीश खेतानी "हरी")

Monday, September 6, 2010

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समभाव से ही संप संभव बनता है,

जो हमें कुछ लाभदायक सिखाये, या जिसकी राय से हमारे जीवन को कोई नई राह मिले तो वह शिक्षक, सही शिक्षक, माँ-बाप की तरह हमेशा इश्वर से काफी करीब होता है, जो जन्म और उचित शिक्षा का दान करके हमें कुछ अलग रूप देने का प्रयास करते है,
 ऐसे शिक्षको के दिन पर,

सभी मित्रों और रिश्तों को शुभ और लाभ भरी कामनायें, 

 

 ऐसे तमाम शिक्षको को मेरा नम्र निवेदन है कि अपने विद्यार्थिओं की कोई भूल के वक्त,
क्षमादान और समाधान से काम लेते हुए उनकी भूलों को दूर करने का प्रयास जारी रखे,
न कि उसका बहिस्कार करके उन्हें शिक्षा दान से वंचित रखे,
और शिक्षा दान के दौरान कोई भेदभाव भी नहीं रखना चाहिए,
ऐसा करने से विद्यार्थी में अवगुण पैदा हो जाते है, जो उन्हें नई राह से विमुख बना देते है,
सही शिक्षण से जो विमुख बनायें वह काम शिक्षक का नहीं,
क्योंकि समभाव से ही संप संभव बनता है,
इसलिए जो संप और संयम से अपने या दूसरों के जीवन को सजाये वही जीवन शिक्षक भी हो सकता है,

Monday, April 5, 2010

जो विषय अपने चुना है, उस पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है, प्रतिभाव अछे भी मिल सकते है और बुरे भी, फिरभी मै संक्षिप्त में यही कहना पसंद करूँगा कि मनभेद और मतभेद बढ़ने लगे है, इसलिए शादी का महत्व कम होता जा रहा है, प्रेम कम और वासना अधिकतम नजर आ रही है, उम्र की लम्बाई कम महसूस होती है, महेनत कम होती जा रही है, लोगो को कम समय में बिना जरुरी महेनत किये बड़ा बनना है,इसीलिए घरवाली और बच्चे, रास्ते का अवरोध लगता है, आज की टीवी चेनलो ने भी लोगो की दिमागी हालत को खोखला करने में बड़ी भूमिका निभाई है, इंटरनेट का जरिया भी उतना ही खतरनाक साबित हो रहा है, लोगो को एक से संतोष नहीं हो रहा है इसलिए अधिक में मानने लगे है, बाहरवाली का पता चलता है तो घरवाली से मनभेद हो जाता है, गृहस्ती में पहले जितना विश्वास नहीं रहा है, शक की मात्रा बढ़ रही है, इस प्रकार के बहुत से कारण है जो नई पेढ़ी को गुमराह कर रहा है, जीवन पुराने हिन्दुस्तानी जैसा संयमी और विवेकी नहीं रहा है, विदेशी जीवन का मिश्रण बढ़ रहा है, जोकि अभी ज्यादा कुछ बिगड़ा भी नहीं है, अगले पंद्रह साल के बाद जो हालत होंगे वह तो आज से भी काफी गुना अधिक ख़राब होंगे, तब आज जो हालत है वह बेहतर लगेंगे, तब जब बेटे की शादी होंगी तब बाप शायद हयात ही नहीं होंगे, या फिर दादा की उम्र के होंगे, यह भी हो सकता है कि बिना शादी किये, लोग सरेआम शादीशुदा की तरह रहने लगेंगे, ताकि मतभेद होने लगे तब बिना कोई रस्म निभाए छुटकारा हांसिल किया जा सके,        
            जिस समस्या की हम चर्चा कर रहे है दोस्तों ! वह केवल युवा वर्ग से ही नहीं बल्कि हर वर्ग से संबधित है, बच्चो के आसार भी बदले हुए है, बुढो के स्वभाव में भी वासना तेज नजर आ रही है, संत समाज हो या मंदिर का पवित्र आँगन, नेता हो या विद्या शिक्षक, हर वर्ग के विचार और संस्कार में पवित्रता कम नजर आ रही है, अजीब सी दौड़ लगी हुई है, देखादेखी और दूसरो को पीछे छोड़ने की दौड़,मानसिकता बदली हुई है, सब अपने आपको दूसरे के मुकाबले में अधिक उतम दिखाने की कशमकश में, अछे जीवन से दूर होते जा रहे है, खुद की बुराइया को नजर अंदाज करके दूसरो की अछाईया की कड़ी टिक्का करने में लगे हुए है, यह बिगाड़ हर वर्ग में असाद्य रोग की तरह फैला हुवा है, संत वर्ग भी अपने मार्ग से भटके हुए है, इसलिए मनुष्यों को सही राह नहीं दिखा पा रहे है, नेता लोग भी जनता को गुमराह कर रहे है, किस किस को दोष देंगे हम, सब दोषी की तरह जी रहे है,