Monday, August 25, 2014

Aaj Mausam Bada Baiman Hai

Thursday, April 24, 2014

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Monday, April 21, 2014

Sunday, December 2, 2012

तो! जीवन में उदासीनता हरगिज न होती,

सभ्यता से भरे हुए जीवन की भव्यता,
मेहनत से भरे हुए जीवन की महानता,

काश! ऐसी सुंदरता हर जीवन में होती,
यदि ऐसी उदारता एकएक ह्रदय में होती,
तो! जीवन में उदासीनता हरगिज न होती,

( श्री हरीश खेतानी "हरि" )

कास! आकाश ने कोई एक आकांशा पलकों में बसाई होती,



हँसाना था जितना बस फूलों की तरह दिल को हँसा लिया,
बसाना था जितना खास फलों की तरह पल में बसा लिया,
फिर बसंत, बहारें न जाने कब और कहां हुई नज़रों से बाहर,
कहना था जितना इतिहास हलों की तरह हलक से कह दिया,
कास! आकाश ने कोई एक आकांशा पलकों में बसाई होती,
आँखें दर्द से बेबस बरसती रही दर-ब-दर, बनके बरसात,
नदियाँ अश्कों के जरियें बनके झरनें , सागर में समाती रही,
मगर बसंत को कोई खास वजह न मिली फिर से बनने की,
कास! आकाश ने कोई एक आकांशा पलकों में बसाई होती,

श्री हरीश खेतानी "हरि"

Saturday, May 12, 2012

( सफ़ेद अंधकार )
हा,
दुनिया में ऐसा भी हो सकता है कि फूलों आसमान पे खिले, और तारें जमीन पर,
अगर तस्वीर को उलटी करके देखा जाए तो,
ऐसे ठोस प्रकाश के लिए, प्रेम का प्रभाव और प्रयास की प्रथम जरुरत होती है,
प्रेम से शक्ति और प्रयास से गति, हर सही शरुआत को मिलती है,
बस, 'सत्यमेवजयते' के भाव रखने वालों का दिल साफ सुथरा हो तो,
सही है कि समय इन्सान को बदलता रहता है,
परंतु इन्सान भी समय को बदल सकता है,
प्रेम के प्रभाव और प्रयास के जरिये,
जो जरिया आज कल काफी कम,
और असत्यों का जरिया कुछ अधिक ही रफ़्तार में है जो सफ़ेद अंधकार बढ़ा रहा है,
सफ़ेद अंधकार !
( श्री हरीश खेतानी "हरि" )
( પ્રભુ નું સ્વર્ગ )
ચપટી વગાડતા ની સાથે બગડેલું બધું જ સુધારી શકવા ની વાતો કરનાર વાસ્તવ માં કહેલું ના કરી સકે તો?
હમેશાં સચાઈ ના પક્ષે ઉભનાર પાત્ર અચાનક ભાવ અને વૃતિ માં પરિવર્તન કરી લે તો ?
તો આવા પ્રકાર ને પાખંડ કહી શકાય.
જોકે ધર્મ, સમાજ, સંબંધો અને ઠેર ઠેર, ડગ ડગ પર પાખંડ ની ભરમાર છે,
આવી દશા માં પ્રભુ ને કેવી રીતે પામી શકાય ?
જે હવા ની જેમ નિરાકાર છે એવા પ્રભુ ને કોઈ પ્રકાર આપવો એ લાંચ આપવા બરાબર છે,
વિચાર ભાવ માં છુપાએલ વિકાર તથા પાખંડી પ્રકાર થી કરેલ દાન પ્રભુ સુધી કેમ પહોચી શકે ?
કેમ કે એ પણ લાંચ ને બરાબર છે,
કોઈ ધર્મ માંથી લાંચ વૃતિ નો અંત થશે ત્યારે દાન ની ભરમાર થશે,
કોઈ દેશ નાં રાજકારણ માં પણ આવી વૃતિ રાખનાર ને કડક દંડ જાહેર થશે તો,
એ દેશ પ્રભુ ના દેશ જેવો સ્વર્ગતુલ્ય હશે,
આપણે સ્વર્ગ ની મહેરછા રાખી શકીએ છીએ પણ અંતે સ્વર્ગ ને પામી સકતા નથી,
કેમકે ભાવ માં ક્યાંક ખોટ રહી ગએલ હોય છે એ આપણે દુર કરી શક્યા નથી,
જીવન માં આવી ખોટ, એ ખોડ ખાપણ થી અશક્ત શરીર ને બરાબર છે,
અને જ્યાં કોઈ ખોટ નથી એ પ્રભુ નું સ્વર્ગ છે,
( શ્રી હરીશ ખેતાણી "હરિ" )

प्रीत तो सब करते है इस जहाँ में,
कोई जहाँ बना सके तो वह आप है,
कोई बनाता है तस्वीर, तो कोई शायरी,
जिसे जीवन बना सके तो वह आप है,
"मानता" तो सब मानते है, हर जन्नत की,
मानवता को कोई जन्नत बना सके तो वह आप है,
सपने भी तो सब देखते है, जी भर कर,
जिसे उपवन बना सके तो वह आप है,
कुदरत ने जो फूल खिलाएं है उसकी कसम,
हमें कोई पहचान बना सके तो वह आप है,
(श्री हरीश खेतानी "हरि")
शुक्रिया,

सब का जिन्होंने मेरी कलम को, शब्दों के जरिये पढ़ा,

और दिल से प्रतिभाव भी प्रकट किए,

अब पेश है वह गाना जो मेरी पसंद में से एक है,

Friday, May 11, 2012

मिलो जब पवन से, उनकी तस्वीर खिंच लेना,
मिलो जब चमन से, उनके रंगों को चुरा लेना,
मुहब्बत में, दिल की धड़कने लगे बुझती हुई,
जब मिलो फूलों से, उनकी खुशबू समेट लेना,
( श्री हरीश खेतानी "हरि" )
मां !
चाहे जैसी भी हो,
भगवान से मिलोंगे तब वह भी ( कई बाद में मगर ) पहला सवाल यही पूछेंगे,
कि क्या मां से कभी मिले हो ? कैसे?
अगर 'ठीक' से नहीं मिले होंगे यानि डग डग पर 'ठग' के भेष में मिले होंगे,
तो भगवान उन्हें वापिस मनुष्यलोक में नए जन्म के रूप में भेज देते है,
जब यहाँ वहा आने जाने का सिलसिला पूरा हो जाता है तब स्वर्ग में स्थान मिल जाता है,
जिसे मुक्ति कहते है,
जो एक मां, सिर्फ एक मां ही दे सकती है,
जन्म के वक्त भी और,
मृत्यु के बाद भी,
जीवन की शरुआत दूध से है,
अगर अंत शराब से हो तो जन्मदाता का क्या दोष ?
क्योंकि दूध एक सत्य है, जबकि शराब बड़ा झूठ.
(रेगिस्तान में सुंदरवन का आवरण और वर्णन !)
( श्री हरीश खेतानी "हरि")

Monday, November 7, 2011

"भय"

"भय"
जो न केवल डरपोकों को, बल्कि अभय और बहदूरों को भी अक्सर तंग करता रहता है,
भय कई वजहों से पैदा होता है, किसीसे भयजनक या बूरी खबर सुन लेने के बाद,
दिल अजीब सा तनाव महसूस करने लगता है, चाहे भय फ़ैलाने वालों की वह खबर
सही न भी हो, फिरभी मन में जो संदेह होता है वह भय की निशानी है,
यह बात हुई कानो से सुनी हुई ख़बरों की वजह से पैदा हुए हालातों की,
जबकि आँखों से खौफनाक नजारा देख लेने के बाद जो भय की तस्वीर बनती है,
उसकी तासीर भी कुछ अजीब सी ही होती है,
(श्री हरीश खेतानी "हरि")

Monday, May 16, 2011

साक्षात् ईश्वर

किसी शक्ति को पाने के लिए ईश्वर की भक्ति करने के बजाय,
सही भक्ति को पाने के लिए पुरे संयम और स्वयं से शक्ति पैदा करने से,
ईश्वर की शक्ति भक्त के दिल में आ कर चार गुनी हो जाती है,
फिर वहा भक्ति का जो मंदिर बनता है,
वहा साक्षात् ईश्वर भी स्वयं विराजमान हो जाता है,
(श्री हरीश खेतानी "हरि")

कल का राज,

काफी सुझबुझ और भरपूर समजदारी के साथ की गई हर पहल से जो पल,
फिर दो पल, और ऐसी कई पलों से जो फल और फूल खिलते है,
उसके रस, रंग, रूप और सुहास से जो सफल जीवन बनता है,
उसीमें ख़ुशी व् सुखमय कल का भी राज छिपा हुआ होता है,

(श्री हरीश खेतानी ''हरि'')

''जिसे चोरी नहीं माना जाता, उसे चतुराई कहा जा सकता है''


जो लोग धन दौलत के पीछे पड जाते है, ऐसी पक्रिया में वह अक्सर जीवन के नियम और रिवाज तक भूल जाते है,
जो लोग बहुमूल्य रिवाजो का अमल नहीं करते, उन्हें तक, तक़दीर और ताकत का वरदान नहीं मिलता है,
किंतु मन और तन से जो सच्चा, दुरस्त, साफ, और चतुर मानव होता है उन्हें, ऐसे कई वरदान यूँही मिल जाते है,
जिसके बदौलत धन दौलत भी उसके पीछे पड जाती है, ऐसी सफलता को मानव की बड़ी चतुराई मानी जा सकती है.
और सच्चाई तथा चतुराई से जो कुछ भी प्राप्त हुआ हो उसे चोरी का नाम नहीं दिया जा सकता..

कड़ी मेहनत के पसीने की ताकत से जो प्राप्त हो वह चतुराई, ऐसी ताकत के बिना जो मिले वह चोरी.
दौलत के पीछे नहीं, बल्कि दौलत को पीछे पड़ने दो तो वह मानव की चतुराई,
वर्ना चोरी.

मगर अफ़सोस की बात तो यह है कि आजकल हर जगह चतुराई काफी कम देखने को मिलती है,
इसीलिए नकली, बनावट और चोरी का दौर चल रहा है, जहाँ संयम, स्वयं तथा स्व का कोई वर्ग ही नहीं है,
किन्तु स्वर्ग तो चतुराई के दौर में उपलब्ध हो सकता है, वहां ईश्वर भी सदा साक्षात् रूप में विराजमान होते है,

तो फिर उन्हें चोरी के आलम में ढूंढने के गलत प्रयास क्यों ?

( श्री हरीश खेतानी ''हरि'' )

यही तो बड़ा ड्रामा है,

यही तो बड़ा ड्रामा है, लोगो को नासमज मानने का,
ऐसे (खास करके आज के) नेताओ को कम से कम एक साल तक गरीबो की बस्ती में बिलकुल गरीबो की तरह रखने की जरुरत है,
सजा के तौर पर,
ताकि समज सके कि ऐसे करोडो लोगो की मनोदसा तथा स्थिति क्या होती है,
लोगो के विश्वास के साथ खिलवाड़ करने वाले सरकार में रहेंगे तब तक भारत का कतई उदय नहीं होंगा,
उदहारण के तौर पर, मानलो कि अगर राहुल गाँधी को ऐसी सजा दी जाएँ तो क्या वह महात्मा गाँधी बन सकेंगा?
(श्री हरीश खेतानी ''हरि'')

Sunday, December 5, 2010

हँसतें हुए रिश्तो का खूबसूरत बाग़

हँसतें हुए रिश्तो का कोई खूबसूरत बाग़ हो,

जहा रिश्तों में स्नेह की मनमोहक महक हो,

सुख हो या दुःख,  

हर मौसम में मुस्कान और संयुक्ता हो,

हर पल नए मिलन का एहसास हो,

ऐसा कोई जहाँ बने जिसे जीवन कह सके,

जिसकी शक्ति को वक़्त भी मिटा न सके,

ऐसी तक, तक़दीर और ताकत के संगम को "प्यार" कहते है,

जिसमें सद विचार और व्यवहार सम्मलित होते है,

जिसका व्यापार नहीं किया जा सकता,

(श्री हरीश खेतानी "हरि")

?????कदमो का नाम है जीवन......

जो हँस कर हँसा सके, रुला सके और खुद रो भी सके ऐसे मुकामो से गुजरे हुए और, गुजरते हुए कदमो का नाम है जीवन..
जो जीने का कारण भी है, उस कारण में कभी आंसू न बहे हो और मुस्कान न खिली हो तो वह मन के मरण का सबूत भी है, तन और धन का अंत कभी न कभी निरधारित है, किन्तु मन का मरण वाकई बेवक्त हुए बेमौत पतन का प्रमाण है, जिसे दुनिया की यादों की यादी में कोई जगह नहीं मिलती, यदि थोड़ी सी भी जगह मिल जाए तो वह दिल का स्वर्ग है, जिसकी रंगीन फूलों से भरपूर बहारों की हरियाली में, हमेंशा प्रेमभक्ति रस के गीत संगीत समेत गुंजन, सुहासित धुपसली की तरह बरक़रार रहता है,
(श्री हरीश खेतानी "हरि")

Saturday, October 23, 2010

इश्वर से शिकायत

टूटे सितारें जब भी गगन के बंधन से,
मिटे फूल जब भी चमन के आँगन से,
न करना कोई फरियाद, संयम रखना,
रूठे अपने, जब जीवन के अपनेपन से,
(श्री हरीश खेतानी "हरि")


कहने का तात्पर्य यह कि जब हमारी उम्मीदें और सपने टूटते है,
परिवार में से कोई देह का त्याग करता है,
जीवन से कोई हमेंशा के लिए जुदा हो जाता है,
या फिर कोई अपना, किसी भूल या गैरसमज  की वजह से रूठ जाए,
तब दुःख का एहसास स्वाभाविक है,
फिरभी संयम तथा समय को दवा मान कर,
हालातों से समझोता कर लिया जाए तो,
इश्वर से शिकायत रखना नामुमकिन बन जाएंगा,
(श्री हरीश खेतानी "हरि")

दिल का फूल

उल्फ़त की बहारों में, 
हुस्न के चमन में,
प्रेमदिलों की राहों में, 
ख्वाबों, ख्यालों में,
हर हाल में, 
होंठों पे जो गुल मुस्कुरातें है, 
वह सही चाहत के, 
सुहासित सुमन होते है, 
जो सिर्फ दिलों में खिलते है, 
जिसे, 
दिल का फूल कहते है,

(श्री हरीश खेतानी "हरि")

Wednesday, October 20, 2010

आभार कभी निराधार नहीं होना चाहिए,

आभार कभी निराधार नहीं होना चाहिए,
बल्कि उसकी संगीन बुनियाद भी होनी चाहिए,
उसे कोई न कोई आधार के जरिये व्यक्त किया जाए तो वह,
सही मायने में आभार बनता है,
क्योंकि वह अनराधार भाव और भार पूर्वक बना हुआ होना चाहिए,
जो सह और स्व भार तथा भाव से साभार में तबदील हो जाता है,
ऐसे अपार भाव और भार से भरा हुआ आभार का आधार मै,
आपके अमूल सहकार लिए,
आपको सादर समर्प्रित करता हूँ,
आभार!
(श्री हरीश खेतानी "हरि")